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बस उन लकीरों में

  • May 4
  • 1 min read

मैंने भी

सिक्के फैंके थे इस बार

नदी में

मैंने भी दीप जला कर

माँगी एक अरदास

नदी में


मैंने किनारे बैठ कर

होने दिया अंधेरा यूँ भी

मैने माँगीं फिर एक दुआ

टूटते तारों में


मैं बाँध आया एक धागा तेरे नाम का

मैंने बजाईं कई घंटियाँ जा कर मंदिरों में


मैंने माँगा यही कि

तेरे चेहरे की दाईं ओर की

वो तीन लकीरें

मेरे हाथों की

हर लकीर से लंबी हो


तुम मुस्कुराओ

तो इस कदर मुस्कुराओ

मैं बस खो जाऊं

मैं बस ठहर जाऊं

मैं बस सिमट जाऊं

उन लकीरों में

....... बस उन लकीरों में

.... उफ़्फ़ उन लकीरों में.!!


सुबह हो नरम सी

शामें मखमली सी हों

रातें गहरी सी

जिंदगी ठहरी सी हो

वक़्त सुहाना बहता रहे इस कदर

ज़िंदगी बीते ऐसी तहरीरों में


सुनो ना

तेरे माथे की बिंदी

तेरे चहरे की हया

तेरी नजरों की नज़ाकत

तेरे अल्फ़ाज़ों की सदा

मैं नज्म लिखूँ कोई अगर

तो लिखूँ वो बेमतलब सी बातें तेरी मेरी में

अगर जिंदगी

सिमटे तो सिमटे

तेरे दाएं गाल पर पड़ती

तीन लकीरों में

... बस उन लकीरों में

... उफ़्फ़ उन लकीरों में .!!


शायर मलंग

1 Comment


यह कविता बेहद खूबसूरती से लिखी गई है...छोटे-छोटे प्रतीकों के माध्यम से प्रेम को जिस संवेदनशीलता से व्यक्त किया गया है, वह बेहतरीन है। “तीन लकीरों” वाला अलंकार इसे बेहद खास बना देता है। कुल मिलाकर, कविता की खूबसूरती पाठक को उन्हीं भावनाओं से जोड़ देती है, जिनमें इसे लिखा गया है।

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