मैंने भी सिक्के फैंके थे इस बार नदी में मैंने भी दीप जला कर माँगी एक अरदास नदी में मैंने किनारे बैठ कर होने दिया अंधेरा यूँ भी मैने माँगीं फिर एक दुआ टूटते तारों में मैं बाँध आया एक धागा तेरे नाम का मैंने बजाईं कई घंटियाँ जा कर मंदिरों में मैंने माँगा यही कि तेरे चेहरे की दाईं ओर की वो तीन लकीरें मेरे हाथों की हर लकीर से लंबी हो तुम मुस्कुराओ तो इस कदर मुस्कुराओ मैं बस खो जाऊं मैं बस ठहर जाऊं मैं बस सिमट जाऊं उन लकीरों में ....... बस उन लकीरों में .... उफ़्फ़ उन लकीरों में.!!