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कविताएँ, नज़म, ग़ज़ल, लेख, कहानियां, किस्से (संग्रह)


तकनीक शब्द रच सकती है, संवेदना नहीं
तकनीक ने शब्दों को रचने और संवाद को आसान बनाने की हमारी क्षमता को अभूतपूर्व गति दी है, लेकिन क्या शब्दों का निर्माण ही साहित्य है? *काव्यधरा* के प्रथम अंक से प्रेरित यह लेख इसी सवाल के बहाने तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साहित्य और मानवीय संवेदना के रिश्ते को समझने की कोशिश करता है। मशीन भाषा को व्यवस्थित कर सकती है, पर स्मृतियों की गर्माहट, पीड़ा की गहराई और मानवीय अनुभूति को जी नहीं सकती। ऐसे समय में साहित्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मनुष्य को बचाए रखने का मा
Aug 19
बस उन लकीरों में
मैंने भी सिक्के फैंके थे इस बार नदी में मैंने भी दीप जला कर माँगी एक अरदास नदी में मैंने किनारे बैठ कर होने दिया अंधेरा यूँ भी मैने माँगीं फिर एक दुआ टूटते तारों में मैं बाँध आया एक धागा तेरे नाम का मैंने बजाईं कई घंटियाँ जा कर मंदिरों में मैंने माँगा यही कि तेरे चेहरे की दाईं ओर की वो तीन लकीरें मेरे हाथों की हर लकीर से लंबी हो तुम मुस्कुराओ तो इस कदर मुस्कुराओ मैं बस खो जाऊं मैं बस ठहर जाऊं मैं बस सिमट जाऊं उन लकीरों में ....... बस उन लकीरों में .... उफ़्फ़ उन लकीरों में.!!
May 4
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